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जानिए हरी खाद के बारे में कुछ नया

पृथ्वी की ऊपरी परत, जिसमें वनस्पतियां उगती हैं और हम खेती करते हैं, उसे मृदा कहते हैं। मृदा की एक पतली परत बनने में सैकड़ों वर्ष का समय लग सकता है और इसे बनाने में कार्बनिक पदार्थों जिन्हें ह्यूमस कहते हैं, की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आधुनिक कृषि तकनीकी तथा सघन कृषि पद्धतियाँ अपनाकर कृषि उपज बढ़ाने हेतु संसाधनों का निरन्तर दोहन किया जा रहा है जिसके कारण मृदा की उर्वरता कम हो जाती है। जिसे बढ़ाने के लिये रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग किया जा रहा है क्योंकि कम्बाइन का प्रचलन बढ़ने, फसल अवशेषों को जलाने की प्रथा तथा पशुपालन कम होने के कारण गोबर व कम्पोस्ट खादों की उपलब्धता न के बराबर हो गयी है। इस सब का परिणाम यह हो रहा है कि मृदा की आनुवंशिक उत्पादन क्षमता का ह्रास हो रहा है, मृदा की भौतिक दशा बिगड़ रही है। ऐसी दशा बन चुकी है कि रासायनिक खादों की मात्रा बढ़ाने पर भी उपज में लाभकारी वृद्धि नहीं हो पा रही है। मृदा की आनुवंशिक उर्वरता को बनाये रखना टिकाऊ खेती के लिये आवश्यक है। ऐसी परिस्थिति में हरी खाद का अधिकाधिक प्रयोग करना ही एकमात्र विकल्प है।


उपयुक्त फसलें
हरी खाद के लिये उन दलहन एवं अदलहन फसलों का चुनाव किया जा सकता है जिनकी वृद्धि दर अच्छी हो, मृदा में शीघ्र सड़ने योग्य हों तथा उत्पादन लागत कम आती हो। इसके लिये दलहन फसलों में सनई, ढैंचा, उर्द, मूंग, लोबिया तथा ग्वार और अदलहन फसलों में ज्वार, बाजरा, मक्कासूर्यमुखी  आदि का उपयोग किया जा सकता है किन्तु दलहन फसलें अधिक उपयुक्त होती हैं। क्षारीय व ऊसर मृदा हेतु ढैंचा ज्यादा उपयुक्त होता है। उर्द अथवा मूंग की फलियों की तुड़ाई के बाद पौध को मिट्टी में मिलाना आर्थिक रूप से लाभकारी होता है।

सारणी    हरी खाद हेतु उपयुक्त फसलें
फसल      प्रयुक्त बीज   प्रयुक्त नत्रजन  प्रयुक्त फास्फोरस  हरी खाद उपज  हरी खाद से प्राप्त
            किग्रा0/हे0   किग्रा0/हे0      किग्रा0/हे0      मी0 टन/हे    नत्रजन किग्रा0/हे0
सनई            50         20           50             25           90
ढैंचा             40         20           50             25           100
उर्द/मूंग          25         10           40             15            50
ज्वार/लोबिया      40         10           40             20           80
ज्वार/बाजार       40         20           50             25           60
                              
उत्पादन तकनीकी
हरी खाद हेतु उपयुक्त प्रमुख फसलों  का  विवरण  सारणी  में  दिया गया है जिसका अनुसरण किया जा सकता है। इन सभी फसलों हेतु बुवाई का उपयुक्त समय अप्रैल से जुलाई माह होता है। सिंचाई  की सुविधा होने पर अप्रैल-मई में बुवाई कर देना चाहिये जब कि असिंचित दशा में मानसून आने पर जून-जुलाई में बुवाई होती है। बुवाई के 40 दिनों बाद फसल को मिट्टी पलट हल से पलटकर खेत में पानी भर देना चाहिये और पाटा लगाकर उसमें धान की बुवाई अथवा रोपाई कर देना चाहिये। किन्तु इसके लिये पाटा लगाने से पूर्व धान हेतु संस्तुत रासायनिक उर्वरक खेत में छिड़क देते हैं। अधिक दिनों की फसल होने पर सड़ने में कठिनाई होती है तथा अधिक समय लग सकता है।
हरी खाद से लाभ

हरी खाद से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है फलस्वरूप मृदा की आनुवंशिक उत्पादन क्षमता व भौतिक गुणों में सुधार होता है। हरी खाद से मृदा की जल धारण क्षमता बढ़ने के कारण फसल पर सूखे का प्रभाव कम हो जाता है और अच्छा वायु संचार होने के कारण जड़ों की कार्य क्षमता बढ़ जाती है। हरी खाद के लिये दलहन फसलें लेने पर मृदा में नत्रजन का स्थिरीकरण होता है और फसल के लिये नत्रजन उर्वरक की कम मात्रा आवश्यक होती है। हरी खाद के कारण मृदा में अनुपलब्ध दशा में पड़ा फास्फोरस फसलों के लिये उपलब्ध हो जाता है। हरी खाद द्वारा मृदा के स्वास्थ्य में सुधार होता है व उत्पादन लागत को कम किया जा सकता है। उपरोक्त के अतिरिक्त हरी खाद से खरपतवार पर नियंत्रण एवं मृदा पी0एच0 मान में सुधार होता है।
 

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